जाने क्या हैं ज्योतिष के 6 मुख्य तत्व

जाने क्या हैं ज्योतिष के मुख्य तत्व

ॐ श्री गणेशाय नमः ।। ॐ नमः पूर्वज्येभ्य:।। ॐ श्री ईष्ट देवाय नमः।।

वेदों का महत्वपूर्ण अंग ज्योतिष शास्त्र है और संपूर्ण ज्योतिष का आधार जन्मपत्री रचना है। सही जन्मपत्री बनाने के लिए ज्योतिष के मुख्य तत्वों का ज्ञान आवश्यक है। प्रारंभ में ज्योतिष के अन्तर्गत मुख्यत: तीन तत्व माने गए थे। इन्हें स्कंधत्र्य या त्र्यस्कंध कहा जाता था। कुछ समय बाद इसमें दो तत्व सामुद्रिक शास्त्र और शकुन शास्त्र जोड़कर ज्योतिषीय रूप से इन्हें पंचस्कंध माना गया। कुछ समय बाद प्रश्न शास्त्र जोड़ा गया। प्रारम्भ में सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र और प्रश्न शास्त्र को त्र्यस्कंध के अंतर्गत ही लिया जाता था परंतु इनका विस्तृत क्षेत्र होने के कारण इन्हें पृथक भाग में रख वर्तमान में ज्योतिष के 6 मुख्य तत्व हैं।
1- सिद्धांत स्कंध या गणित तंत्र
2- संहिता स्कंध
3- जातक स्कंध या होरा शास्त्र
4- सामुद्रिक शास्त्र
5- शकुन शास्त्र
6- प्रश्न शास्त्र

1- सिद्धांत या गणित स्कंध 

इसके अंतर्गत जिस समय किसी जातक का जन्म हुआ उस समय ग्रहों की गति, स्थिति, ग्रहों का जातक पर पड़ने वाला प्रभाव आदि, काल मान के योग, अंतर, गुणा, भाग, ग्रहों की जाति, रूप, गुण, मार्ग – वक्री, शीघ्र – मंद, उच्च – नीच, जन्म फल दशा क्रम, भावफल गणित विवेचन, ग्रहों के उदय – अस्त आदि परिणाम की विवेचना की जाती है। अधिमास ( इसे क्षय मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।) , नाड़ी, योग, करण आदि का वर्णन रहता है। सभी ग्रह निरंतर गतिशील है। जिस समय जातक का जन्म हुआ, उस समय ग्रहों की आकाशीय स्थिति के अनुसार ग्रहों का प्रभाव, उनके होने वाले परिणाम का विचार इसके अन्तर्गत होता है।
इसमें त्रुटि से लेकर प्रलय काल तक की गणना, सौर, चंद्र, सावन, नाक्षत्र, मास, काल, ग्रह संचार का विस्तार तथा गणित प्रक्रिया की उत्पत्ति, ग्रहों, नक्षत्रों, पृथ्वी की स्थिति का वर्णन किया गया है। इस स्कंध से संबंधित ग्रंथ मकरन्द ज्योतिष, ज्योर्तिगणित, सूर्य सिद्धान्त आदि हैं।
ज्योतिष और कालनिर्णय भविष्यफल का आधार गणित है, इसमें गलती होने पर संपूर्ण फलादेश और भविष्य कथन में गलती होती है। अतः गणित प्रक्रिया में पूरी सावधानी रखना आवश्यक होता है।

2- जातक शास्त्र या जातक स्कंध 

इसे होरा शास्त्र या होरा स्कंध भी कहते हैं। इसके अंतर्गत जन्म कालीन ग्रहों की स्थिति के अनुसार व्यक्ति के शुभाशुभ का विवेचन किया जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी प्रश्नों का समाधान, मानव जीवन के संभावित अशुभ को ग्रह नक्षत्र द्वारा जानकर उनका वेद विहित समाधान देता है। इसमें जन्म कुंडली के द्वादश भावों के फल, उनमें स्थित ग्रह, ग्रहों के पारस्परिक संबंध, जन्मफल, आयुर्दाय, दशाक्रम, आजीविका, अष्टक वर्ग, ग्रहों के भावफल, राजयोग, स्त्रीजातक फल आदि का अध्ययन किया जाता है। अर्थात मानव जीवन में दिन-रात जो कुछ भी घटित होता है, उन सब का वर्णन इसके अंतर्गत किया जाता है। मानव जीवन में सुख-दुख, उन्नति-अवनति, भाग्योदय, संतान आदि के समस्त शुभ अशुभ का वर्णन इसी शास्त्र के द्वारा या इसी स्कंध के अंतर्गत होता है।इस स्कंध के प्रसिद्ध ग्रंथ वृहत् जातक, वृहत् पाराशर होरा शास्त्र, फलदीपिका, उतरकालामृत, लघुपाराशरी आदि हैं।

3- संहिता स्कंध या संहिताशास्त्र 

यह गणित सिद्धांत तथा फलित दोनों का मिश्रण है, जिसमें गणित सिद्धांत तथा फलित होरा के मिश्रित रूप का अर्थात ज्योतिष के सभी पक्षों का विवेचन और विचार किया जाता है। अतः यह महत्वपूर्ण होता है। ग्रहों की गति, युति, मेघ वर्षा, लक्षण, तिथि, दिन नक्षत्र योग, सूर्य आदि ग्रह, सूर्य संक्रांति, गर्भाधान, नामकरण, अन्नप्राशन, कर्णवेध, उपनयन, समापवर्तन, विवाह, प्रतिष्ठा, यात्रा, गृह प्रवेश का मुहूर्त आदि का विचार किया जाता है। इसमें ग्रह नक्षत्रों के भू पृष्ठ पर पड़ने वाले प्रभाव, की उल्का विचार, भूकंप विचार, ग्रह वास्तु विचार, ग्रहण आदि के जगत में पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन होता है। अतः इसे वैश्विक ज्योतिष या भौतिक ज्योतिष भी कहते हैं। वृहत संहिता, गर्ग संहिता, वशिष्ठ संहिता, नारद संहिता आदि इसके प्रमुख ग्रंथ है।
इसके अंतर्गत रत्न शास्त्र का भी अध्ययन होता है। रत्नों के ग्रह संबंधी उपचार, उन का मानव जीवन पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है? उनका ग्रहों के साथ संबंध, रत्न उपचार और रत्न रश्मियों का ग्रहों के साथ संबंध का अध्ययन भी किया जाता है। इस आधार पर संपूर्ण जन्मकुंडली का विवेचन होता है

4- सामुद्रिक शास्त्र

यह एक प्राचीन विद्या है जिसमें शारीरिक अंगों के अनुसार शारीरिक लक्षणों, हस्तरेखा और स्वर शास्त्र , शरीर में तिल आदि का अध्ययन होता है। जन्मपत्री या जन्मकुंडली के लिए सही दिनांक, समय और स्थान ज्ञात होना बहुत जरूरी है क्योंकि समय के थोड़े से अंतर से इष्टकाल, गणित में अंतर आ जाता है इससे कुंडली के फलादेश में अंतर आता है। लेकिन हस्त रेखा सामुद्रिक शास्त्र के अंतर्गत गलत फलादेश की संभावना नहीं रहती क्योंकि हाथ की रेखाएं तो जन्म के साथ ही आ जाती है और शरीर के लक्षण स्पष्ट होते हैं। सामुद्रिक शास्त्र की अपनी विशेषता है। अतः प्रातःकाल में हथेली का दर्शन शुभ माना जाता है क्योंकि हाथ के अग्रभाग में मां लक्ष्मी, मध्य भाग में विद्यादात्री मां सरस्वती और मूल में पालनहार भगवान विष्णु का निवास होता है।

5- शकुन शास्त्र

ज्योतिष के अंतर्गत शकुन शास्त्र का अपना महत्व है। मुख्यत: यह सामुद्रिक शास्त्र के अन्तर्गत आता है परंतु विस्तृत क्षेत्र होने से इसे अलग शास्त्र के रूप में रखा गया है। शकुन अनेक प्रकार के होते हैं। पशु पक्षियों के शब्द, उनकी गतिविधियां, अपने अंगों का फड़कना, शरीर के विभिन्न स्थानों में खुजली, आकाशीय वर्षा के प्रकार, मूर्ति, पत्थर और पानी के अनेक लक्षण, यात्रा के समय मिलने वाले पदार्थ, छींक आदि यह सब शकुन शास्त्र के अंतर्गत आते हैं। शकुन चाहे सपने में दिखे या खुली आंख से, यह पशु पक्षियों के द्वारा हो या दिव्य शक्तियों द्वारा, किसी भी अवस्था में उनका कार्य है शुभ या अशुभ के भावी संकेत घटना को बताना और हमें उसके प्रति सावधान करना। शकुन व्यक्तिगत, समूह, क्षेत्र, विशेष, राष्ट्र आदि से विभिन्न प्रकार संबंधित होते हैं। शकुन होने पर सकारात्मक परिणाम, कार्य सिद्धि ,सफलता प्राप्त होते हैं शुभ शकुन होने पर कार्य की सफलता के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाते हैं और परिणाम भी उसी प्रकार सकारात्मक प्राप्त होता है। अशुभ शकुन प्राप्त होने पर नकारात्मक परिणाम प्राप्त होते हैं। उस हेतु सावधानी रखकर सजगता से नकारात्मक प्रभाव को कम से कम किया जा सकता है और अशुभ प्रभाव को दूर कर सकते हैं।

6- प्रश्न शास्त्र

यह ज्योतिष का महत्वपूर्ण अंग है। इसके अंतर्गत समस्या के समाधान हेतु प्रश्नकर्ता के प्रश्न का तात्कालिक ग्रह स्थिति के आधार पर उत्तर दिया जाता है।
प्रश्न कुंडली के द्वारा अनेक शंकाओं का समाधान किया जाता है। आयु,यात्रा,सुख, वस्तु विशेष, खोये हुए सामान संबंधित वाहन,रोग, निर्णय प्रश्न आदि संबंधित प्रश्नों का विवेचन किया जाता है। जन्म कुंडली न होने पर भी प्रश्न कुंडली द्वारा विवेचन किया जाता है।


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लेखक : पंडित त्रिभुवन कोठारी (ज्योतिषी​)

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“जो दे लोगों को सही मार्ग यही है ज्योतिष कार्य”

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